कविताएँ

ग़ज़ल ४३.कहती है वायज की नज़र .

कहती है वायज की नज़र .
आज है मयकदे का सफ़र .
आपका देखना फिर हुनर .
साकी पयमाना तो भर .
हो जायेगा दीदारे- रम .
ऐ दिल तू ज़रा सब्र कर .
बज्में रिन्दाना में शैख़ जी..
वज्द में है इधर से उधर ..
हम सभी रिंद रिश्ते में हैं .
आज इस बात पर बात कर.
कब किधर रात गई " रंजन "
हो गई मयकदे में सहर ..
राजेंद्र ' रंजन "