कविताएँ

ग़ज़ल 7..जरा संभल कर..

 
दोड़ने वालों जरा सभल कर 
आसां नहीं है हर रहगुज़र. ..
 
अंधी-दौड़ का थाम सिलसिला  
अरे यार ! कुछ तो सबर कर. 
 
बिगड़े हालात हैं आज पहाड़ों के. 
घर की जमीं पर ही सजदा कर. 
 
उलझनों से उलझनाछोड़ दे.. 
जरा काबलियत पर गौर कर. ..
 
खूबसूरती की चाहत दौलत का नशा. 
घड़ी दो घड़ी की हैं बस ये मुख़्तसर.. .
 
सुन ! कल तू शहंशाह बन भी जाना. 
आज अपनी बेतुकी बातों को बंद कर. 
 
सिर्फ सोचने से कुछ होता नहीं रंजन '.. 
जो भी करना है तुझे आज ही कर.. ..
 
राजेन्द्र ''रंजन''