कविताएँ

ग़ज़ल (( रात यूँ बसर् हो गयी..) संसोधित

07/07/2013॥(साथ-साथ तेरा ...)
 गज़ल

रात यूं ही बसर हो गयी !
आरज़ू में सहर हो गयी।!

प्यार मैंने किया ज़िंदगी !
और तू दर्दे-सर हो गयी ।!

बस जरा मुस्कराये थे हम ।
ये खुशी भी जहर हो गयी।!

डुबना ही मुक़द्दर में था !
हर दुआ बे-असर हो गयी।!

साथ तेरा दो घड़ी का था !
सारे जमाने को खबर हो गयी!!

जो थे कल तक तेरे 'रंजन' !
नजर उनकी  बदनजर हो गयी ॥

रात यूं ही बसर हो गयी!
आरज़ू में सहर हो गयी !!
राजेंद्र 'रंजन'