कविताएँ

ग़ज़ल..९ आग -हवा की बस्ती है...


आग-हवा की बस्ती है..
मैं  डरा-डरा सा रहता हूँ..

जिस गली में भी जाऊँ।
तन्हा-तन्हा सा चलता हूँ..

कौन सुखी ये तो  रब जाने..
रफ्ता-रफ्ता दुःख सहता हूँ ..

समंदर की गहराई न जानूँ..
मरुभूमि में बूंद-बूंद बहता हूँ..

 जश्ने-ज़िंदगी सबको मुबारक ..
मैं घर में सहमा-सहमा रहता हूँ... 

राजेंद्र रंजन