कविताएँ

ग़ज़ल १२..देवालय की घंटी..

देवालय की घंटियाँ बजती हैं कभी -कभी...
कैदखाने का घंटा बजता है रोज घड़ी-घड़ी...

जमीन पर शदियों से इंसान है ज़ार-ज़ार...
दूरदर्शन पर रोज बातें होती हैं बड़ी-बड़ी...

बदती हैं डीजल-पेट्रोल की दरें रोज-रोज ...
अफसोस महंगी पियाज भी है सड़ी-सड़ी ...

बे-मौसम बरसात से सारी फसले बैठ गयीं...
बाप का उदास चेहरा देखती है बेटी खड़ी-खड़ी...

गरीब-झोपड़ी से अंधेरे कभी ज़ुदा होते नहीं ...
आलीशान-महलों पर नाचती है लड़ी-लड़ी...

हरे-भरे दरखत बड़े गमगीन हैं "'रंजन'"...
रिश्वती अमरवेल पेड़ पर खुश है चड़ी -चड़ी...