कविताएँ

ग़ज़ल..१३..जोड़ने की चाह...

जोड़ने की चाह में रिश्ते चटकते रहे...
रहमदिल होकर भी हम खटकते रहे...

धूप में कपासी बादल चमकते कितना ...
मामूली सी हवा में रोज बिखरते रहे ...

पतझड़ की फिजां / उजड़ा हुआ चमन ...
खुशनसीब गुल काँटों में भी महकते रहे...

शराफत का चौला / विरक्ति का दिखावा...
चाहतों के स्वप्न मन में मचलते रहे...

आम-खास की पहचान किसे है ' रंजन '
काले- बाज़ार में खोट्टे-सिक्के चलते रहे...

राजेंद्र रंजन..