कविताएँ

ग़ज़ल ..16...जीने के लिए रिश्तों को बचा रखा है..

जीने के लिए रिश्तों को बचा रखा है..
बजारू-दुनिया में वरना क्या रखा है..

झिलमिलाती रोशनी से कर ली तौबा..
उजालों के लिए दिल को जला रखा है..

खुशबुए -गुल बिखरती है गुलास्तां में ..
हमने तो बस सेज़े-ख़ार सजा रखा है..

अब न कोई राह है मुझे न कोई चाह है ..
उलझे-सवालों का काफिला बना रखा है..

एशो-आराम किसे कहते हैं 'रंजन '
फ़क़त हसरतों ने गले लगा रखा है..

राजेंद्र रंजन