कविताएँ

ग़ज़ल ..१७ ..हसरतें बे-असर कर न सका ..

हसरतें बे-असर कर न सका ..
नाज़ से बसर कर न सका ..

दोस्त तो बहुत मिले या-रब ..
दिल में किसी के घर कर न सका ..

जिसकी रहमत से सब मिलता रहा ..
दिल से उसका शुक्रिया कर न सका ..

सबको गलत कहते - कहते ..
खुद पर नज़र कर न सका ..

इस दिलशिकन जमाने से 'रंजन '
दिलकशी बे -असर कर न सका ..

राजेंद्र 'रंजन '..