कविताएँ

ग़ज़ल 18..टूटा गर सपना तो गम कैसा ..

टूटा गर सपना तो गम कैसा ..
ये जंहा तो है जैसा का तैसा ..

अपना समझ सबको गले लगाओ..
दौर सबका आ सकता है ऐसा-वैसा ..

दिल में चुभेंगे तिनके बागवां के ..
हर गुल नहीं है गुलाब के जैसा ..

हुनर जिसे लूटने का आ गया ..
उस शख्स हर ईमान है पैसा ..

किसी की कोई कभी सुनता नहीं ..
सब-कुछ यंहा है वैसे का वैसा..

अब सोचना छोड़ भी दे ' रंजन '
बेबजह सोचता है कैसा-कैसा ..

राजेंद्र रंजन ..