कविताएँ

ग़ज़ल..१९ ..गिरगिट, आजकल आदमी से हैरान है

गिरगिट, आजकल आदमी से हैरान है..
अरे भाई उसकी भी तो कोई पहचान है..

गाँधी के तीनों बंदर कोई समझता नहीं..
समाज-सेवा भी चलती-फिरती दूकान है..

गंगा मैली हुई सब खड़े -खड़े देखते रहे ..
देखिये ! फिर से सफाई का फरमान है ..

वक़्त, आदमी और चक्रीय-परिवर्तन..
प्रकृति से हर रोज बदलता जहान है..

कलंदर-सिकंदर सब मुकद्दर के धनी थे.
मेरा क्या ! वही पुराने वाले भगवान् है..

राजेंद्र रंजन