कविताएँ

ग़ज़ल 20..भीगी आँखों ने न जाने क्या क्या देखा है..


भीगी आँखों ने न जाने क्या क्या देखा है..
कंहीं जलते गाँव तो तन्हा शहर देखा है..

होश में आने का मशवरा दिया न करो..
जुदा हमराह और भटका डगर देखा है..

कैसा करार और कैसी मोहब्बत ?
हर चाहने वाले को दर-बदर देखा है..

गिले-शिकवे करने की आदत नहीं साकी..
यादों -वादों का क्या तुमने असर देखा है..

ऊँचे ओहदे की दरकार किसे है ' रंजन '
तख्तों-ताजों को यूँ होते खंडहर देखा है..

राजेंद्र रंजन