कविताएँ

ग़ज़ल ..21..बात -बात पर रोने की जरुरत क्या

बात -बात पर रोने की जरुरत क्या है 

खुली आँख सोने की जरुरत क्या है..

सपना देखना तो कोई बुरी बात नहीं..
झूठे-वादों में खोने की जरुरत क्या है..

खाली आया, खाली हाथ जाएगा..
मालोमाल ढोने की जरुरत क्या है..

हर डाल पर गुलों को खिलने दो..
सूखे-हार में पिरोने की जरुरत क्या है..

न डर न डराने की बात कर ' रंजन '
नाहक दुखी होने की जरुरत क्या है..

राजेंद्र रंजन..

 है..