कविताएँ

ग़ज़ल ..23..सूखे जख्म जब दोस्त हरा कर देते हैं .

सूखे जख्म जब दोस्त हरा कर देते हैं ..
जीने के लिए हौसला खड़ा कर देते हैं..

हर सुबह और शाम का दीवाना था मैं..
मेरे गम रात का पहरा बड़ा कर देते हैं..

मेरी हर अदा पर गूंजती थी तालियाँ ..
अब आंसुओं पर प्रश्न खड़ा कर देते हैं..

अपने हौसले को रोज सलाम करता हूँ..
मरने पर अपने तश्वीर मढ़ा कर देते हैं..

जब तक ओहदा था ' रंजन' अच्छा था ..
अब हँसने के नियम कड़ा कर देते हैं..

राजेंद्र रंजन ..