कविताएँ

ग़ज़ल..२ रात यूँ ही बसर हो गयी..

रात  यूँ ही बसर हो गई ,
आरज़ू में सहर हो गई ..

प्यार मैंने  किया जिंदगी ,
और तू दर्दे सर हो गई ..

बस जरा मुस्कुराए थे हम ,
ये ख़ुशी भी जहर हो गई ।

डूबना ही मुक्कदर में था ,
हर दुआ बेअसर हो गई ।

जो थे कल तलक तेरे "रंजन "
उनकी नजर बदनजर हो गई ..


राजेंद्र रंजन ...