कविताएँ

ग़ज़ल..२५ ..कंही साकी तो कंही जाम नहीं मिलते ..



कंही साकी तो कंही जाम नहीं मिलते ..
कंही जमीं तो कंही आसमां नहीं मिलते..

यूँ तो, खुशुबुओं से आबाद रहता है चमन ..
तलाश-ए-बहारां में दिली-गुल नहीं खिलते..

कहने को हज़ारों दोस्त मिले राहे-कारवां में ..
वक़्त पड़े चाक -गरेबां दिल को नहीं सिलते ..

हमें पता हैं वक़्त बदलेगा जरुर एक दिन ..
सदियों की तफसीरें वक़त यूँ नहीं लिखते..

जख्म-ए-दिल की नुमौईस कैसे करूँ ' रंजन'
कातिल जमाने वाले हिलाए से नहीं हिलते ..

राजेंद्र रंजन..