कविताएँ

ग़ज़ल..२६ ..चौराहें आज चलने लगे हैं.

चौराहें आज चलने लगे हैं..
राहगीर हैरां के हैरां खड़े है..

खोटे सिक्कों का चलन है..
चोखे दाम घड़ों में पड़े हैं..

मज़हबी सियासती चालें तो देखो..
आदमी आदमियत पर अड़े-पड़े हैं..

हम वासी हैं मोहब्बत नगर के..
प्रेम डगर के पैरों में छाले पड़े हैं..

अल्लाह का नाम लेकर सो जाता हूँ..
फकीरों के घर 'रंजन ' कब डाके पड़े हैं..

राजेंद्र रंजन