कविताएँ

कता..1

कता..

हर भरोसा हर क्यों रोज टूट जाता है..

जख्मी-दिल का गम से पुराना नाता है..


टूट जाते हैं शीशे-दिल के लोग ' रंजन '


हमें तो भीगी आँखों से हँसना आता है..


राजेंद्र ' रंजन '