कविताएँ

ग़ज़ल..3.हर रात की सुबह होती है..

हर रात की सुबह होती है
हर बात की सुलह होती है ..

होती हैं मुरादें  भी पूरी ,
बेदाग अगर रूह होती है ..

क्यों हो उसे खौफे जलजला ,
जिसकी ठोस सतह होती है ..

लोग कहते हैं  बहार जिसे ,
वो  तुम सी हंसी होती है ..

झांक पत्थर के जिगर में "रंजन"
प्यार की शै हर जगह होती है ..


राजेंद्र रंजन ...