कविताएँ

gazal..29.. निज़ाम वही बस सियासत बदली है..

निज़ाम वही बस सियासत बदली है...

लोग कहने लगे हैं जनमत बदली है..

 

पढ़ने लगे हैं लोग तरक्की के कसीदे..

आदमी वही है बस करामत बदली है..

 

खटखटाने पर ही खुलते हैं दरवाजे ..

कुदरत ने अपनी क्या नेमत बदली है..

 

जितना चाहो हासिल कर लो बुलंदी..

पसीने ने इंशा की किस्मत बदली है..

 

अमला गमला बंगला सब  है  ' रंजन '

हसरतों की यार कब फितरत बदली है..

 

राजेंद्र रंजन..