कविताएँ

gazal ..31..सर्द हवा या गमे-मौसम की अंगड़ाई है..

सर्द हवा या गमे-मौसम की अंगड़ाई है..
मेरी जान ! हमने जीने की सज़ा पाई है ..
सूनी सड़कों पर उदास आँखें ठहरी हैं..
यादों के झरोखें से पहचानी सदा आई है..
कैसे भूलाये उन प्यार के नगमों को ..
ग़मों से गुलज़ार मेरी रोज तन्हाई है..
जुगनुओं की रौशनी से दिल में उजाला है..
सितारों भरी रात ने शोलों की सेज सजाई है..
ख़ाक कर न सकेंगे जलते हुए शोलें ' रंजन '
ऐ-मोहब्बत ! तूने कब जमाने से मात खाई है..
राजेन्द्र रंज