कविताएँ

gazal..32..खिजां को हम रंगी बनाना चाहते हैं,,

खिजां को हम रंगी बनाना चाहते हैं,,
गुलिस्तां का दामन सजाना चाहते है,,

गैरों को ता-उम्र अपना ही मानते रहे..
अपनों में गैरों को पहचानना चाहते हैं..

किसी से किस बात का कैसे गिला करूँ ?
अपनी नादानिओं पर मुस्कराना चाहते हैं..

सारी खताएं और सज़ाएँ हैं मेरे ही खातिर ..
गोया अपनी वफाओं को भुलाना चाहते हैं..

दिल के किसी कोने में रहता है कोई ' रंजन "
जंहा वाले की निगाहों से उसे छुपाना चाहते हैं..

राजेंद्र " रंजन "