कविताएँ

gazal..34..अपनी जुबान का ख्याल कर प्यारे

अपनी जुबान का ख्याल कर प्यारे 
नादां मैं और जालिम ज़माना है..
भोंकने वाले कम नहीं दुनिया में..
हाथी को तो बस चलते जाना है..
मेरे उसूल ही मेरी मंजिल हैं..
हकीकत यही मेरा खजाना है..
ओछे आदमी का क्या कहना ?
दो-मुखे सांप सा सयाना है..
कब्र में पैर लटकाकर बैठा है..
अपनों के लिए भी बेगाना है..
राजेंद्र रंजन ..