कविताएँ

gazal..37..अपनी फरेबियों पर मुलम्मा चढ़ाया न करो..

अपनी फरेबियों पर मुलम्मा चढ़ाया न करो..
फनकारों के आगे बे-सुरे गीत गाया न करो..
सब जानते हैं कि अंजामे-इश्क क्या है ..
दीवानों की गली में हंसकर जाया न करो..
वफ़ा-बे-वफ़ा इरादे- वादे सब जानता हूँ..
लैला-मजनू के किस्से सुनाया न करो..
यह भी सच कि दूर तक कोई साथ देता नहीं..
फिर रोज पास आने के बहाने बनाया न करो..
जैसे भी हैं ज़िंदा हैं यारों के वास्ते ' रंजन '
बे-मौसम बिरहा - गीत यार गाया न करो..
राजेंद्र रंजन ..